जिले भर में ईद का पर्व मुस्लिम भाइयों ने आज शांतिपूर्ण ढंग से मनाया। लाकडाउन की वजह से शासन के निर्देशानुसार ईदगाह में मात्र पांच लोग ही नमाज अदा किये, समुदाय के बाकी सभी लोगों ने घर में ही नमाज अदा कर त्यौहार मनाया। इस दौरान न तो किसी से गले मिला गया न ही हाथ मिलाया गया। सेवई खाने के पर्व पर पहले हिन्दू समुदाय के लोग भी मुस्लिम समुदाय के लोगों के घर जाकर बधाई देने के अलावा सेवाइयां खाते थे लेकिन लाकडाउन के कारण इस बार बधाई देने का सिलसिला मोबाइल के माध्यम से ही ज्यादातर रहा।
इस संबंध में अल्लाका सैयद कामिल रजा कादरी सीधी ने बताया कि ईद रोजे पूरे होने के जश्न का दिन है। 30 दिन तक रोजेदार पूरे इमान से रोजे के कायदों को जीता है, 31वें दिन अल्लाह को रोजे पूरे होने का शुक्रिया करने के लिए ईद पर मुंह मीठा करता है। लेकिन, इस्लाम को ना जानने वाले या कम जानने वालों के मन में कई तरह के सवाल होते हैं। रमजान का महीना ही क्यों चुना गया रोजे के लिए, 30 दिन ही रोजे क्यों रखे जाते हैं, क्या रमजान के महीने का कुरान लिखे जाने से कोई संबंध है? उन्होने बताया कि रमजान के महीने में 30 दिन रोजे रखना ये कुरान शरीफ की भी हिदायत है। पैगंबर साहब का कहना था कि साल के 12 में से 11 महीने हम दुनियादारी में जीते हैं। खुद की बेहतरी के लिए समय नहीं निकालते। रमजान के पूरे महीने (30 रोजे) इसके लिए फर्ज किए गए हैं। खुद को बेहतर बनाने, दुनियादारी से अलग खुद को नेकी की राह पर चलाने और लोगों की मदद करने के लिए इस एक महीने को चुना गया है। इसमें अपनी आमदानी का ढाई फीसदी जकात (दान) करने का कायदा बनाया गया है। रोजा सिर्फ खाने से दूर रहने का नहीं है, बल्कि सोच, कर्म और हर तरह से अपनी शुद्धता के लिए है।
ईद पर्व पर मो. इद्रीश ने कहा कि देश में कोरोना जैसी बीमारी की वजह से इस बार हम लोग घर में ही नमाज अदा किये हैं। सेवइयां खाने एवं एक-दूसरे के घर जाकर बधाई देने का सिलसिला हर वर्ष इस पर्व पर रहता था। लेकिन लाकडाउन की वजह से इस शांतिपूर्ण ढंग से ही घर में रहकर ईद का पर्व मनाया गया। उन्होने कहा कि हम अल्लाह से यही दुआ मांगे हैं कि कोरोना जैसी बीमारी देश में खत्म हो, लोगों में भाईचारे की भावना यथावत बनी रहे।