साधारण से साधारण काम के लिए शिक्षकों को देना पड़ता है सुविधा शुल्क
कृतिका: सीधी
इनदिनों सीधी के शिक्षा विभाग में लूट अपने चरम पर है। हमारा देश चाहे कितना भी डिजिटल हो जाए लेकिन कागजी कार्यवाही को आगे बढ़ाने, उसको अपने अंजाम तक पहुँचाने के लिए जिस प्रकार कार्यालय के कर्मचारी की जरुरत पड़ती है ठीक उसी तरह शिक्षकों के हर क्लेम और आदेश के लिए पहल विभाग के बाबुओं से ही होती है क्योंकि पूरा काम उन्हें ही निपटाना होता है, अधिकारी के तो केवल हस्ताक्षर होते हैं। इसी वजह से शिक्षक पूरी तरह विभागीय कर्मचारियों (बाबुअों) के उपर आश्रित सा रहता है, इसीलिए अपने कार्य को पूरा करवाने, अपने क्लेमों का भुगतान पाने, क्रमोंन्नती पाने, अनुकंपा नियुक्ति पाने, स्वयं के जी.पी.एफ. की राशि से अपने पुत्र-पुत्रियों के विवाह हो, घर का निर्माण कार्य हो अथवा अन्य कोई आवश्यक कार्य हो, अपनी ही राशि आहरित कराने के लिए शिक्षक अपना शिक्षकीय दायित्व छोड़कर जहां कार्यालय के बाबुओं के चक्कर लगाता है, मिन्नतें करता है, वहीं सुविधा शुल्क के नाम पर मुंहमांगी रकम भी चढ़ाता है तब कहीं जाकर वह अपने कार्य को पूरा करवाने की कोशिश कर पाता है।
सीधी जिले के शिक्षा विभाग में मची लूट से पूरे जिले भर के शिक्षक हैरान और परेशान रहते हैं यहां कई कई वर्षों से कुंडली मारकर बैठे बाबू ना किसी की सुनते हैं और ना ही पैसे लिए बिना किसी को गुनते हैं। जिला शिक्षा अधिकारी सीधी के कार्यालय में पदस्थ कार्यालयीन बाबुओं को लाचार शिक्षकों की न तो परेशानी दिखती है और न ये दिखता है कि शिक्षक के पास वेतन के अलावा अन्य कोई आय का स्रोत नहीं है उसके बावजूद भी विभिन्न शाखाओं में बैठे प्रभारी बाबू शिक्षकों से सुविधा शुल्क के नाम पर मनचाही रकम ऐठना शायद अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं।
प्रदेश में भाजपा की सरकार बदलकर कांग्रेस की आई और अब फिर कांग्रेस की सरकार बदलकर भाजपा की आ गई है परंतु सीधी जिले के शिक्षा विभाग में आखिर कब लगाम लगेगा बाबूशाही के इस लूट-खसोट पर, कौन खत्म करेगा सुविधा शुल्क लेने की यह सनातनी परम्परा….? आखिर कब अपने सभी प्रकार के स्वत्वों के निराकरण हो जाने पर शिक्षक राहत की सांस लेगा ? इसकी गारंटी कौन राजनीतिक दल या प्रशासनिक अधिकारी लेगा यह आज तक तय नहीं हो सका है। यह विभाग का वो कटु सत्य है जिसे न तो बाबू नकार सकता है न शिक्षक और न ही कोई अधिकारी….l