आरएसएस के नेतृत्व वाली एनडीए ने नयी शिक्षा नीति (एनपीई) को मंजूरी दे दी है। यह नीति शिक्षा को पूर्णतः बाजार के हाथों में सौंपने का मसौदा है। सरकारी स्कूलों के माध्यम से शिक्षा का सर्वभौमीकरण करने, गरीब एवं सामाजिक तौर पर पिछड़े तबकों की गुणवत्ता शिक्षा प्रदान करने की मांग को यह शिक्षा नीति खारिज करता है। सार्वजनिक, वित्त पोषित शिक्षा के अभाव में सामाजिक न्याय संभव नहीं है, जो थोड़ा बहुत सामाजिक न्याय मिल रहा था उसका भी खात्मा हो जावेगा।
संसदीय प्रणाली एवं संघीय ढांचे को विलकुल दरकिनार कर दिया गया है। सरकार अपने नौउदारवादी नीतियों के आक्रामक रुप से लागू कर रही है इससे देश की जनतांत्रिक प्रणाली पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। शिक्षा के निजीकरण, व्यावसायीकरण एवं केंद्रीय करण पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा, परिणाम स्वरुप शिक्षा महंगी होगी एवं विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता खत्म हो जावेगी। शिक्षण संस्थानों में स्थायी नौकरियां खत्म हो जायेगी। सरकार शिक्षा के जीडीपी का 6 प्रतिशत हिस्सा लेगी, यह दशकों पहले कोठारी आयोग द्वारा बनाया गया एक प्रस्ताव था। भाकपा की मांग है कि 10 प्रतिशत से अधिक शिक्षा पर खर्च हो।
भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के राज्य परिषद सदस्य कामरेड आनंद पांडेय ने कहा एनपीई शिक्षा व्यवस्था को निजी हाथों, वोर्ड आफ गवर्नेस के हाथों सौंप देगी। विश्व व्यापार संगठन के निर्देश पर विदेशी विश्वविद्यालयों को आमंत्रित किया जा रहा है 50000 शिक्षण संस्थानों को कम करके 15000 तक लाने का प्रस्ताव है, 3000 से कम क्षात्रों की संख्या वाले महाविद्यालय बंद कर दिया जाएगा या विलय कर दिया जाएगा, इससे क्षेत्रीय असमानता बढेगी। आईआईएम, आईआईटी, आईआईएससी जैसी संस्थाओं को भी बंद करने की संभावना बढ गयी है। विषेशज्ञता आधारित संस्थानों के संचालन में कठिनाई आयेगी, सामाजिक न्याय का अध्ययन करने वाले की पढ़ाई का नुक़सान अलग से होगा क्योंकि सिक्षा वाजार के मांग के अनुसार चलायी जावेगी।
भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी सरकार से मांग करती हैं कि संसद में नयी शिक्षा नीति पर उचित चर्चा हो, राज्य सरकारों के साथ भी विमर्श हों जिसकी शिक्षा नीति में सवसे ज्यादा हिस्सेदारी समवर्ती सूची में है।