कृष्ण के प्रेम का प्रतीक है नंदगांव की लठ्ठ मार होली

चेहरे पर लंबा घूंघट, हाथों में लठ्ठ और हास परिहास का अपने अनूठे तरीके से जवाब। प्रेम से पगे लठ्ठ खाने के लिए हुरियारों का उल्लास होली के रंगों को और भी रंगीन कर देता है। बरसाने की कुंज गलियों में लठामार होली का मजा ही कुछ और है । बरसाना में जाकर राधा रानी की सखियों के लठ्ठों से घायल हुए हुरियारों का नंदगांव की हुरियारने लठ्ठों से हिसाब लेती है । नंद भवन सज गया है, दूर तक नील गगन अबीर से गुलाबी होने के लिए तैयार खड़ा है। नंदगांव की रंगीली गली में अनूठी पंरपरा की तस्वीर बनेगी।जी हां, ब्रज की अनूठी होली है। नंदगांव में लठामार होली खेली जाती है । बरसाना की लठमार होली के अगले दिन यानी फाल्गुन शुक्ल दशमी को बरसाना के हुरियारे नंदगांव की हुरियारिनों से होली खेलने उनके यहां पहुँचते है । लठामार होली से पूर्व बरसाना और नंदगांव के गोस्वामी समाज के मध्य गायन होता है । इसके बाद बरसाना के हुरियारे नंदगांव की हुरियारनों संग हास परिहास करते है और इसी मनो विनोद के मध्य शुरु हो जाती है लठामार होली। कृष्ण के प्रेम के प्रतीक स्वरूप इस परंपरा को देखने के लिए देश विदेश से हजारों नंदगांव पहुंचते हैं।
